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Sheikh Hasina Father: शेख मुजीबुर रहमान के नक्शेकदम पर हसीना, जब बेटी की तरह पिता को भी मिली थी मौत की सजा, बाद में हुई हत्या.

Reported By : Saif Khan : शेख हसीना को बांग्लादेश की अदालत ने मौत की सजा सुनाई है। उन्हें मानवता के खिलाफ अपराध का दोषी करार दिया गया है। हालांकि, यह पूरी सुनवाई शेख हसीना की गैरमौजूदगी में हुई। माना...

Reported By : Saif Khan : शेख हसीना को बांग्लादेश की अदालत ने मौत की सजा सुनाई है। उन्हें मानवता के खिलाफ अपराध का दोषी करार दिया गया है। हालांकि, यह पूरी सुनवाई शेख हसीना की गैरमौजूदगी में हुई। माना जा रहा है कि यह फैसला राजनीति से प्रेरित है और इसे मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार ने पहले से तय कर रखा था।

ढाका: बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवता के खिलाफ अपराध का दोषी पाते हुए मौत की सजा सुनाई है। शेख हसीना पर पिछले साल जुलाई-अगस्त में हुए विद्रोह के दौरान मानवता के विरुद्ध अपराध के आरोप तय किए गए थे। शेख हसीना वर्तमान में भारत में रह रही हैं। यह मुकदमा उनकी गैरमौजूदगी में चलाया गया था। इससे पहले उनके पिता शेख मुजीबुर रहमान को भी ऐसे ही आरोपों में मौत की सजा सुनाई गई थी। हालांकि, बाद में चुनाव जीतने के बाद पाकिस्तान की सरकार को उन्हें रिहा करना पड़ा था। लेकिन, बाद में एक तख्तापलट के दौरान शेख मुजीबुर रहमान की उनके परिवार के कई सदस्यों के साथ हत्या कर दी गई थी।

जब शेख मुजीबुर रहमान की पार्टी ने जीता चुनाव

शेख मुजीबुर रहमान को बंगबंधु के नाम से भी जाना जाता है। वह न सिर्फ बांग्लादेश के संस्थापक थे, बल्कि उन्होंने ही पाकिस्तान के कब्जे से तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान को आजाद भी कराया था। 1970-71 के चुनावों में शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग ने प्रांतीय विधानसभा में 300 में से 288 सीटें जीतीं। उनकी पार्टी ने पश्चिमी पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में 300 में से 167 सीटों पर भी जीत दर्ज की। इतनी भारी जीत के बावजूद, अवामी लीग को पाकिस्तान के तत्कालीन जनरल याह्या खान के नेतृत्व वाले पाकिस्तान के सैन्य प्रशासन ने सरकार बनाने की अनुमति नहीं दी।

शेख मुजीबुर रहमान ने दिया यादगार भाषण

मार्च 1971 को, शेख मुजीबुर रहमान ने पश्चिमी पाकिस्तान प्रशासन का विरोध करने के लिए ढाका के रेसकोर्स ग्राउंड में एक ऐतिहासिक भाषण दिया। उनके इस भाषण को सुनने के लिए मौके पर करीब 10 लाख लोग मौजूद थे। उन लोगों के हाथों में लाठी और डंडे थे। ये सब पाकिस्तानी सेना के हमलों से बचने के लिए नहीं, बल्कि अवज्ञा के तौर किया गया था। लोगों ने पाकिस्तानी सेना के आदेशों का पालन करने और टैक्सों का भुगतान करने से इनकार कर दिया। उनके इस भाषण का असर इतना ज्यादा था कि हालात को संभालने के लिए पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल याह्या खान खुद पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) पहुंचे।

याह्या खान ने शेख मुजीबुर रहमान को सत्ता सौंपने से किया इनकार

उनके ढाका पहुंचते ही यह साफ हो गया कि चुनावों में भारी जीत हासिल करने के बावजूद याह्या खान शेख मुजीबुर रहमान को सत्ता सौंपने से इनकार करने जा रहे हैं। उन्होंने 23 मार्च को शेख मुजीबुर रहमान को प्रेसिडेंट हाउस बुलाया गया। इस दौरान मुजीबुर रहमान अपनी कार में बांग्लादेश का झंडा लगाकर प्रेसीडेंट हाउस पहुंचे, लेकिन बात नहीं बनी। 25 मार्च को यह खबर फैल गई कि याह्या खान पाकिस्तान वापस लौट गए हैं। उनके बांग्लादेश छोड़ते ही पाकिस्तानी सेना ने ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू कर दिया। इसका उद्देश्य बांग्लादेश की आजादी की हर आवाज को किसी भी कीमत पर कुचलना था।

पाकिस्तानी सेना ने शेख के आवास पर बोला धावा

उसी रात पाकिस्तानी सेना की एक टुकड़ी 32 धनमंडी स्थित शेख मुजीबुर रहमान के आवास पर पहुंची। सैनिकों ने पहुंचते ही गोलीबारी शुरू कर दी, जिससे शेख की सुरक्षा में तैनात एक स्थानीय सुरक्षा कर्मी को भी एक गोली लगी और उसकी तुरंत मौत हो गई। इस दौरान सेना के अफसर ने लाउडस्पीकर पर चिल्लाकर कहा कि वह शेख मुजीबुर रहमान को पकड़ने आए हैं। उन्होंने शेख से नीचे आकर आत्मसमर्पण करने को कहा। पाकिस्तानी सैनिकों की गोलीबारी को देखते हुए शेख मुजीबुर रहमान नीचे आए और सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया। शेख को बंदूकों के बट से धक्का देकर जीप पर बैठाया गया और उन्हें वहां से लेकर निकल गए।

शेख को पाकिस्तानी सेना ने किया गिरफ्तार

गिरफ्तार करने वाले आर्मी अफसर ने अपने कमांडर जनरल टिक्का खान को वायरलेस पर पूछा कि क्या वह गिरफ्तार किए गए शेख मुजीबुर रहमान से मिलना चाहते हैं। इस पर टिक्का खान ने जवाब दिया कि वह उनका चेहरा तक देखना पसंद नहीं करेंगे। इसके बाद शेख मुजीबुर रहमान को तीन दिनों तक कैंटोनमेंट के अकादमी कॉलेज में रखा गया। इसके बाद उन्हें पाकिस्तान की मियांवाली जेल में शिफ्ट कर दिया गया। यहां की कालकोठरी में उन्हें न तो अखबार दिया गया और ना ही टेलीविजन की सुविधा दी गई। उन्हें पूरी तरह से बाहरी दुनिया से काट दिया गया।

शेख मुजीबुर रहमान को सुनाई गई फांसी की सजा

शेख मुजीबुर रहमान मियांवाली जेल में करीब 9 महीने तक रहे। इस दौरान 6 दिसंबर को भारत-पाकिस्तान युद्ध की समाप्ति की घोषणा की गई, लेकिन अपनी हार से बौखलाई पाकिस्तानी सेना ने शेख मुजीबुर रहमान के लिए कुछ और ही प्लान करके रखा था। पाकिस्तान की सैन्य ट्राइब्यूनल ने शेख मुजीबुर रहमान को मौत की सजा सुनाई। इस बीच पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन हो गया और जुल्फिकार अली भुट्टो राष्ट्रपति चुने गए। उनके आदेश पर शेख मुजीबुर रहमान को मियांवाली जेल से निकालकर रावलपिंडी के एक गेस्ट हाउस में शिफ्ट कर दिया गया।

जुल्फिकार ने शेख के सामने क्या ऑफर रखा

इस बीच जुल्फिकार अली भुट्टो पर शेख मुजीबुर रहमान को रिहा करने का अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता ही जा रहा था। हालांकि, पाकिस्तान ने इतनी आसानी से शेख को रिहा करने से इनकार कर दिया। एक दिन पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो, शेख मुजीबुर रहमान से मिलने के लिए रावलपिंडी के गेस्ट हाउस पहुंच गए। उन्होंने शेख को ऑफर दिया कि अगर बांग्लादेश विदेश मामले, रक्षा और संचार को पाकिस्तान के साथ मिलकर चलाए को वह उन्हें तुरंत रिहा कर सकते हैं। हालांकि कई दौर की बातचीत के बावजूद शेख ने जुल्फिकार के इस ऑफर को मानने से इनकार कर दिया।

पाकिस्तान ने शेख मुजीबुर रहमान को कब रिहा किया

पाकिस्तान ने 7 जनवरी 1972 को शेख मुजीबुर रहमान को रिहा कर दिया। उन्हें पाकिस्तान से विदा करने के लिए खुद जुल्फिकार अली भुट्टो चकलाला एयरपोर्ट पहुंचे। हालांकि, इस दौरान दोनों नेताओं में कोई बातचीत नहीं हुई। शेख पहले लंदन गए और वहां से दो दिन बाद नई दिल्ली लौटे। नई दिल्ली एयरपोर्ट पर उनकी भव्य अगवानी की गई। इस दौरान भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति वी वी गिरी, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, उनका पूरा मंत्रिमंडल, तीनों सेनाओं के प्रमुख और दूसरे कई गणमान्य लोग मौजूद थे। इसके बाद शेख मुजीबुर रहमान ढाका पहुंचे, जहां 10 लाख लोगों की भीड़ ने उनका स्वागत किया और अगले ही दिन उन्होंने राष्ट्रपति पद की शपथ ली।

शेख मुजीबुर रहमान की हत्या कैसे हुई

शेख मुजीबुर रहमान ने बांग्लादेश को व्यवस्थित करना शुरू कर दिया, लेकिन 1975 आते-आते चीजें उनके हाथ से निकलना शुरू हो गईं। देश में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, लूटमार की घटनाएं बढ़ने लगी। इससे न सिर्फ सेना बल्कि लोगों में भी असंतोष फैलने लगा। 15 अगस्त, 1975 की सुबह बांग्लादेशी सेना के कुछ जूनियर अफसरों ने शेख मुजीबुर रहमान के 32 धनमंडी स्थित आवास पर हमला बोल दिया। इसके बाद उन सैनिकों ने जो भी सामने दिखा, उसे निशाना बनाना शुरू कर दिया। शेख ने बांग्लादेश सेना के शीर्ष अधिकारियों को फोन किया और हालात के बारे में बताया, लेकिन कोई एक्शन नहीं हुआ। इस दौरान हमलावर सैनिकों ने शेख मुजीबुर रहमान को गोलियों से छलनी कर दिया और उनकी मौत हो गई।

Shahnawaz Khan

शहनवाज़ खान एक समर्पित पत्रकार हैं, जो सटीक और प्रभावशाली खबरों के लिए जाने जाते हैं। वे वर्तमान घटनाओं, जनहित के मुद्दों और ट्रेंडिंग विषयों पर निष्पक्ष रिपोर्टिंग करते हैं। सत्य और विश्वसनीय पत्रकारिता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पाठकों को जागरूक और सूचित रखने का कार्य करती है।
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